मंगलवार, 28 नवंबर 2017

सूरदासजी के दोहे

 

दोहा :- “मुखहिं बजावत बेनु धनि यह बृन्दावन की रेनु | नंदकिसोर चरावत गैयां मुखहिं बजावत बेनु || मनमोहन को ध्यान धरै जिय अति सुख पावत चैन | चलत कहां मन बस पुरातन जहां कछु लेन न देनु || इहां रहहु जहं जूठन पावहु ब्रज बासिनी के ऐनु | सूरदास ह्यां की सरवरि नहिं कल्पब्रूच्छ सुरधेनु ||”
अर्थ :- राज सारंग पर आधारित इस पद में सूरदास कहते है की ब्रजरज धन्य है जहां नंदपुत्र श्रीकृष्ण गायों को चराते हैं तथा अधरों पर रखकर बांसुरी बजाते हैं | उसी भूमी पर श्यामसुंदर का स्मरण करने से मन को परम शांति मिलती हैं | सूरदास मन को प्रभोधित करते हुए कहते हैं की अरे मन ! तू कहे इधर उधर भटकता हैं | ब्रज में ही रह, जहां व्यावहारिकता से परे रहकर सुख की प्राप्ति होती हैं | यहां न किसी से लेना, न किसी को देना | सब ध्यानमग्न हो रहे हैं | ब्रज में रहते हुए ब्रजवासियों के जूठे बरतनों से जो कुछ प्राप्त हो उसी को ग्रहण करने से ब्रह्ममत्व की प्राप्ति होती हैं | सूरदास कहते हैं की ब्रजभूमि की समानता कामधेनु भी नहीं कर सकती | इस पद में सूरदास ने ब्रज भूमी का महत्व प्रतिपादित किया हैं |
दोहा :- “बुझत स्याम कौन तू गोरी | कहां रहति काकी है बेटी देखी नहीं कहूं ब्रज खोरी || काहे कों हम ब्रजतन आवतिं खेलति रहहिं आपनी पौरी | सुनत रहति स्त्रवननि नंद ढोटा करत फिरत माखन दधि चोरी || तुम्हरो कहा चोरी हम लैहैं खेलन चलौ संग मिलि जोरी | सूरदास प्रभु रसिक सिरोमनि बातनि भूरइ राधिका भोरी ||”
अर्थ :- सूरसागर से उध्दुत यह पद राग तोड़ी में बध्द है | राधा के प्रथम मिलन का इस पद में वर्णन किया है सूरदास जी ने | श्रीकृष्ण ने पूछा की हे गोरी ! तुम कौन हो ? कहां रहति हो ? किसकी पुत्री हो ? हमने पहले कभी ब्रज की इन गलियों में तुम्हेँ नहिं देखा | तुम हमारे इस ब्रज में क्यों चली आई ? अपने ही घर के आंगन में खेलती रहतीं |इतना सुनकर राधा बोली, मैं सुना करती थी की नंदजी का लड़का माखन चोरी करता फिरता हैं | तब कृष्ण बोले, लेकिन तुम्हारा हम क्या चुरा लेंगे | अच्छा, हम मिलजुलकर खेलते हैं | सूरदास कहते हैं की इस प्रकार रसिक कृष्ण ने बातों ही बातों में भोली-भाली राधा को भरमा दिया |

 

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