मंगलवार, 28 नवंबर 2017

Kabir Ke Dohe


 Kabir Ke Dohe


दोहा  “जैसा भोजन खाइये, तैसा ही मन होय। जैसा पानी पीजिये, तैसी बानी सोय।”
अर्थ – ‘आहारशुध्दी:’ जैसे खाय अन्न, वैसे बने मन्न लोक प्रचलित कहावत है और मनुष्य जैसी संगत करके जैसे उपदेश पायेगा, वैसे ही स्वयं बात करेगा। अतएव आहाविहार एवं संगत ठीक रखो।


दोहा “इष्ट मिले अरु मन मिले, मिले सकल रस रीति। कहैं कबीर तहँ जाइये, यह सन्तन की प्रीति।”
अर्थ – उपास्य, उपासना-पध्दति, सम्पूर्ण रीति-रिवाज और मन जहाँ पर मिले, वहीँ पर जाना सन्तों को प्रियकर होना चाहिए।


दोहा  “देह खेह होय जायगी, कौन कहेगा देह। निश्चय कर उपकार ही, जीवन का फन येह।”
अर्थ – मरने के पश्चात् तुमसे कौन देने को कहेगा ? अतः निश्चित पूर्वक परोपकार करो, यही जीवन का फल है।

 बीर दोहा “ऐसी बनी बोलिये, मन का आपा खोय। औरन को शीतल करै, आपौ शीतल होय।”
हिन्दी अर्थ – मन के अहंकार को मिटाकर, ऐसे मीठे और नम्र वचन बोलो, जिससे दुसरे लोग सुखी हों और स्वयं भी सुखी हो।



दोहा  “धर्म किये धन ना घटे, नदी न घट्ट नीर। अपनी आखों देखिले, यों कथि कहहिं कबीर।”
अर्थ – धर्म (परोपकार, दान सेवा) करने से धन नहीं घटना, देखो नदी सदैव बहती रहती है, परन्तु उसका जल घटना नहीं। धर्म करके स्वयं देख लो।

सूरदासजी के दोहे

 

दोहा :- “मुखहिं बजावत बेनु धनि यह बृन्दावन की रेनु | नंदकिसोर चरावत गैयां मुखहिं बजावत बेनु || मनमोहन को ध्यान धरै जिय अति सुख पावत चैन | चलत कहां मन बस पुरातन जहां कछु लेन न देनु || इहां रहहु जहं जूठन पावहु ब्रज बासिनी के ऐनु | सूरदास ह्यां की सरवरि नहिं कल्पब्रूच्छ सुरधेनु ||”
अर्थ :- राज सारंग पर आधारित इस पद में सूरदास कहते है की ब्रजरज धन्य है जहां नंदपुत्र श्रीकृष्ण गायों को चराते हैं तथा अधरों पर रखकर बांसुरी बजाते हैं | उसी भूमी पर श्यामसुंदर का स्मरण करने से मन को परम शांति मिलती हैं | सूरदास मन को प्रभोधित करते हुए कहते हैं की अरे मन ! तू कहे इधर उधर भटकता हैं | ब्रज में ही रह, जहां व्यावहारिकता से परे रहकर सुख की प्राप्ति होती हैं | यहां न किसी से लेना, न किसी को देना | सब ध्यानमग्न हो रहे हैं | ब्रज में रहते हुए ब्रजवासियों के जूठे बरतनों से जो कुछ प्राप्त हो उसी को ग्रहण करने से ब्रह्ममत्व की प्राप्ति होती हैं | सूरदास कहते हैं की ब्रजभूमि की समानता कामधेनु भी नहीं कर सकती | इस पद में सूरदास ने ब्रज भूमी का महत्व प्रतिपादित किया हैं |
दोहा :- “बुझत स्याम कौन तू गोरी | कहां रहति काकी है बेटी देखी नहीं कहूं ब्रज खोरी || काहे कों हम ब्रजतन आवतिं खेलति रहहिं आपनी पौरी | सुनत रहति स्त्रवननि नंद ढोटा करत फिरत माखन दधि चोरी || तुम्हरो कहा चोरी हम लैहैं खेलन चलौ संग मिलि जोरी | सूरदास प्रभु रसिक सिरोमनि बातनि भूरइ राधिका भोरी ||”
अर्थ :- सूरसागर से उध्दुत यह पद राग तोड़ी में बध्द है | राधा के प्रथम मिलन का इस पद में वर्णन किया है सूरदास जी ने | श्रीकृष्ण ने पूछा की हे गोरी ! तुम कौन हो ? कहां रहति हो ? किसकी पुत्री हो ? हमने पहले कभी ब्रज की इन गलियों में तुम्हेँ नहिं देखा | तुम हमारे इस ब्रज में क्यों चली आई ? अपने ही घर के आंगन में खेलती रहतीं |इतना सुनकर राधा बोली, मैं सुना करती थी की नंदजी का लड़का माखन चोरी करता फिरता हैं | तब कृष्ण बोले, लेकिन तुम्हारा हम क्या चुरा लेंगे | अच्छा, हम मिलजुलकर खेलते हैं | सूरदास कहते हैं की इस प्रकार रसिक कृष्ण ने बातों ही बातों में भोली-भाली राधा को भरमा दिया |

 

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